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भारत सरकार ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है। अब देश में बिकने वाले हर नए स्मार्टफोन में “संचार साथी” ऐप पहले से इंस्टॉल होना अनिवार्य होगा। दूरसंचार विभाग (DoT) ने सभी मोबाइल निर्माता कंपनियों और आयातकों को 90 दिन के अंदर यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। अगर कंपनियाँ ऐसा नहीं करतीं, तो उन पर टेलीकॉम एक्ट 2023 और साइबर सिक्योरिटी रूल्स 2024 के तहत सख्त कार्रवाई हो सकती है।
सरकार इसे साइबर फ्रॉड और मोबाइल चोरी के खिलाफ बड़ा कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे “नागरिकों की जासूसी का औजार” करार दे रहा है। आइए समझते हैं कि आखिर यह ऐप करता क्या है, इसके फायदे क्या हैं और विवाद की असल वजह क्या है।
संचार साथी ऐप आखिर करता क्या है?
2023 में लॉन्च हुआ यह सरकारी पोर्टल और ऐप आम लोगों को कई तरह की सुविधाएँ देता है:
- खोया या चोरी हुआ फोन तुरंत ब्लॉक कर सकते हैं
- अपने नाम पर कितने सिम सक्रिय हैं, उसकी पूरी जानकारी एक क्लिक में
- फोन का IMEI असली है या डुप्लीकेट, आसानी से चेक कर सकते हैं
- फ्रॉड मैसेज, स्पैम कॉल्स या संदिग्ध लिंक की शिकायत कर सकते हैं
- विदेशी नंबर से आ रही फर्जी “इंटरनेशनल” कॉल्स रिपोर्ट करें
- बैंकों और वित्तीय संस्थानों के असली हेल्पलाइन नंबर चेक कर सकते हैं
खास बात यह है कि फोन ब्लॉक करने के लिए आपको IMEI नंबर याद रखने या कहीं से ढूँढने की जरूरत नहीं – ऐप खुद सब पता कर लेता है।
सरकार इसे क्यों अनिवार्य कर रही है?
सरकार का तर्क बिलकुल साफ है – हर रोज हजारों लोग फोन चोरी, IMEI क्लोनिंग, फिशिंग और साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं। ज्यादातर लोग संचार साथी के बारे में जानते तक नहीं, नतीजा यह कि चोरी का फोन ब्लॉक नहीं होता और अपराधी उसे दोबारा इस्तेमाल करते रहते हैं। प्री-इंस्टॉल करके सरकार चाहती है कि हर नए फोन खरीदने वाला व्यक्ति शुरू से ही इस सुरक्षा कवच का फायदा उठा सके।
लेकिन विपक्ष को दिक्कत क्यों है?
कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल इसे “गंभीर गोपनीयता हनन” बता रहे हैं। उनके मुख्य सवाल और चिंताएँ ये हैं:
- ऐप को अनइंस्टॉल नहीं किया जा सकता – यानी यूजर की मर्जी के खिलाफ फोन में जबरन रहेगा।
- यह ऐप लोकेशन, कॉल डिटेल्स, मैसेज आदि तक पहुँच मांग सकता है (भले ही अभी ऐसा नहीं कर रहा)।
- क्या भविष्य में सरकार इसका दुरुपयोग कर नागरिकों पर निगरानी नहीं करेगी?
- क्या यह “चीनी स्टाइल सर्विलांस मॉडल” की तरफ पहला कदम तो नहीं?
कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने इसे सीधे-सीधे असंवैधानिक बताया और कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार इससे खतरे में है।
सच क्या है?
देखा जाए तो ऐप के मौजूदा फीचर्स में कोई जासूसी वाला तत्व नहीं दिखता। यह CEIR (सेंट्रल इक्विपमेंट आइडेंटिटी रजिस्टर) से जुड़ा हुआ है, जो पहले से चल रहा सिस्टम है। फोन ब्लॉक करने या IMEI चेक करने के लिए लोकेशन या कॉल लॉग की जरूरत नहीं पड़ती।
लेकिन चिंता जायज भी है – एक बार जब कोई ऐप सिस्टम लेवल पर प्री-इंस्टॉल हो और उसे डिलीट न किया जा सके, तो भविष्य में उसमें क्या-क्या जोड़ा जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। खासकर तब, जब हाल के वर्षों में पेगासस जैसे जासूसी कांड सामने आ चुके हैं।
अंत में…
संचार साथी ऐप आम आदमी के लिए वाकई उपयोगी है – इसमें दो राय नहीं। साइबर ठगी और फोन चोरी से हर दिन लाखों लोग परेशान हैं, और यह ऐप उस दर्द को काफी हद तक कम कर सकता है।
लेकिन जिस तरह से इसे जबरन थोपा जा रहा है और डिलीट करने का विकल्प तक नहीं दिया जा रहा, वह निश्चित रूप से सवाल खड़े करता है। सरकार को शायद इसे वैकल्पिक रखना चाहिए था या कम से कम यूजर को पहली बार फोन सेटअप में “परमानेंटली अनइंस्टॉल” करने का विकल्प देना चाहिए था।
अगर सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन बनाना है, तो पारदर्शिता और यूजर की सहमति सबसे जरूरी है। वरना अच्छा इरादा भी शक के घेरे में आ जाता है।
